Thursday, October 25, 2007
हम तमाशबीन
मन नहीं लग रहा है। तमाशा रोज हो रहा है लेकिन इस तरह से कि समझ नहीं आ रहा है कि ये तमाशा है या फिर असलियत। गुजरा वक्त अपने पीछे कोई निशान नहीं छोड़ रहा है, और आने वाले वक्त की कोई पहचान पुराने किस्सों कहानियों में नहीं है। नानियां ही नहीं रही तो फिर पुरानी कहानियां क्या और उनसे मिली सीख क्या। हर तरफ अफरा-तफरी है। दिमाग कह रहा है कि ठीक हो रहा है दिल कह रहा है कि गलत हो रहा है। यानि न दिल के कहने में दिमाग है न दिमाग के मुतमईन दिल। हर कोई धंधा कर रहा है लेकिन धंधे में कोई नहीं। यानि कहानी है लेकिन कहानी कुछ भी नहीं। दोस्तों जिस तरह से ये बात उलझी हुयी हैं कुछ उसी तरह से दुनिया मेरे सामने उलझी सी है। कुछ लोगों को लगता हैं कि इससे बेहतर वक्त कभी नहीं आया, इतना पैसा, इतनी तरक्की और इतना उंचाईयां कि पहले कभी न देखी गयी न सोची गयी। इसके उलट कुछ लोगों के लिये ये वक्त मौत से बदतर हैं वो इसीलिये मौत को गले लगा रहे है। हजारों की तादाद में किसान, मजदूर, नौजवान जिंदगी के बदले मौत को गले लगाने में ज्यादा आराम महसूस कर रहे है। मैं कभी खुश होता हूं तो कभी दुखी हो जाता हूं, सीधा रास्ता कोई नहीं। हर रास्ते में पेंच, हर खुशी में उलझाव यानि साफ साफ काला सफेद कुछ नहीं है। अब इस तमाशे में हमारा रोल क्या है। न हम बंदर है न मदारी न डमरू हैं न झोला तो फिर हम क्या है । अभी तक लगता हैं कि हम तमाशबीन है। ऐसे तमाशबीन जिनकी गवाही कभी नहीं होगी।
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